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प्रस्तावना:
पतंजलि ऋषि ने कुण्डलिनी योग के महत्वपूर्ण सूत्रों का विवेचन किया है। कुण्डलिनी योग, योग के विभिन्न प्रकारों में से एक है, जो मानव शरीर में सुप्त शक्ति कुण्डलिनी को जागृत करके उसे उन्नति और समाधि की अवस्था तक पहुंचाने का उद्देश्य रखता है। यहां हम पतंजलि ऋषि के द्वारा प्रस्तुत कुण्डलिनी योग सूत्रों का संक्षेप में वर्णन करेंगे: `#
यम: यम अर्थात् नैतिक नियम, जिन्हें पालन करने से चित्त शुद्धि होती है और कुण्डलिनी के जागरण का मार्ग सुलभ होता है। इसमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह के पाँच भाग होते हैं।
नियम: नियम धार्मिक नियम हैं जो व्यक्ति के आचरण को शुद्ध करते हैं और अन्तरंग शक्तियों को जागृत करने में मदद करते हैं। सौच, संतोष, तपस्या, स्वाध्याय, और ईश्वर प्रणिधान इसमें शामिल होते हैं।
आसन: आसन, शरीर के अभ्यास के लिए विशेष रूप से जरूरी होते हैं, क्योंकि इनसे शरीर के अंग विकसित होते हैं, जिससे कुण्डलिनी ऊर्ध्वगामी होती है।
प्राणायाम: प्राणायाम के द्वारा प्राण की शक्ति को नियंत्रित करके कुण्डलिनी को जागृत किया जा सकता है।
प्रत्याहार: प्रत्याहार अर्थात् इंद्रियों के वश से निकलकर अंतरंग ध्यान का मार्ग प्रशस्त होता है और कुण्डलिनी के सम्पूर्ण जागरण की अवस्था तक पहुंचने में मदद करता है।
धारणा: धारणा के माध्यम से मन को एकाग्र किया जा सकता है जिससे कुण्डलिनी को स्थिर करने में सहायता मिलती है।
ध्यान: ध्यान, एक विषय में एकाग्रता की अवस्था है, जो कुण्डलिनी के उन्नति के मार्ग को आसान बनाता है।
समाधि: समाधि, मन की पूर्णता की अवस्था है, जिसमें व्यक्ति कुण्डलिनी को समृद्धि और उन्नति के उच्च स्तर तक पहुंचाता है।
संसार में विभिन्न योग शैलियों में से एक कुण्डलिनी योग, एक उत्कृष्ट और साधना योग है जिससे व्यक्ति अपने असीमित पोटेंशियल को जान सकता है और समृद्धि की अवस्था में पहुंच सकता है। यह सूत्र अध्ययन करने से हम सभी अपने असली स्वरूप को पहचानते हैं और आत्म-उन्नति के मार्ग में अग्रसर होते हैं।
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